नेपियर उत्पादन की महत्वाकांक्षी योजना
उमा कल्याण ट्रस्ट का उद्देश्य है कि कोई भी गोवंश भूखा न रहे, इसलिए नेपियर उत्पादन से प्राप्त हरा चारा अपनी गोशाला (राल गोशाला) के साथ-साथ गोपालक किसानों और छोटी गोशालाओं को भी देने की योजना बनाई गई है, जिससे इन्हें गोवंश के लिए लागत मूल्य पर नेपियर चारा प्राप्त हो सके।
हर मौसम में हरा चारा मिलना कठिन हो जाता है, इसलिए उमा कल्याण ट्रस्ट ने वर्ष भर हरे चारे के रूप में प्राप्त होने वाले नेपियर घास के उत्पादन की योजना बनाई है। इससे आने वाले समय में गोवंश के लिए चारे की समस्या का काफी हद तक समाधान मिल सकेगा।
पहले चरण में मथुरा जनपद के अलग-अलग ब्लॉक और ग्राम पंचायतों में लगभग 1000 एकड़ भूमि पर नेपियर घास के उत्पादन की महत्वाकांक्षी योजना पर काम चल रहा है।
ट्रस्ट द्वारा मथुरा प्रशासन के सहयोग से गांवों में ग्राम पंचायत की खाली पड़ी गोचर भूमि को लेकर नेपियर घास के उत्पादन के लिए उसका उपयोग किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त किसानों से भी नेपियर उत्पादन के लिए लीज/पट्टे पर भूमि ली गई है।
नेपियर उत्पादन की वर्तमान स्थिति
भूमि शोधन और पानी की उपलब्धता के लिए ट्यूबवेल आदि की व्यवस्था के बाद अभी तक नगला डीकड़ी, बढ़ौता अझई, धमसिंगा, शेरगढ़, बलदेव आदि गांवों में लगभग 100 एकड़ भूमि पर नेपियर लगाई जा चुकी है। इन सभी स्थानों पर उमा कल्याण ट्रस्ट द्वारा जैविक विधि से नेपियर की खेती की जा रही है।
यहाँ मई-जून 2025 में नेपियर के डंठल रूपी बीज खेतों में बिछाये गये थे, परन्तु मानसून में अत्यधिक वर्षा के कारण खेतों में पानी भर गया। लगभग एक फीट की ऊंचाई तक पहुंचने के बावजूद नेपियर के पौधे गल गए।
जल निकासी का प्रयास करने पर भी लगभग 35 से 38 एकड़में लगी हुई नेपियर खराब हो गई। इसके बाद फिर से खेत तैयार कर अक्टूबर-नवंबर में नेपियर लगाई गई। इसका परिणाम पहले से अच्छा रहा, जिससे अब गोवंश के लिए हरा चारा मिलने लगेगा।
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प्रथम चरण: लगभग 1000 एकड़ भूमि पर नेपियर उत्पादन की योजना।
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वर्तमान उत्पादन क्षेत्र: लगभग 100 एकड़ में नेपियर की खेती।
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उत्पादन: सामान्यतः 150 से 200 टन प्रति एकड़ प्रतिवर्ष हरा चारा।
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लक्ष्य: प्रति एकड़ 300 से 400 टन तक उत्पादन का प्रयास।
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तकनीकी सहयोग: अधिक उत्पादन के लिए एक कंपनी के साथ MOU किया गया है।
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बीज आत्मनिर्भरता: अब अपनी खेती से नेपियर के बीज तैयार किए जा रहे हैं।
नेपियर घास की उपज और विशेषताएँ
नेपियर घास मुलायम, पाचनशील और पौष्टिक होती है, जिससे यह दुर्बल गोवंश के लिए भी फायदेमंद होती है।
पहली और दूसरी कटाई में उपज कम मिलती है, परंतु तीसरी कटाई से अच्छी उपज मिलने लगती है। अनुमानतः एक वर्ष में 150 से 200 टन प्रति एकड़ हरा चारा मिल जाता है। यह उपज प्रति एकड़ 300 से 400 टन भी हो सकती है, जिसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
अधिक से अधिक नेपियर उत्पादन के लिए ट्रस्ट ने एक कंपनी के साथ MOU साइन किया है। तकनीकी सहयोग से प्रति एकड़ अधिक मात्रा में चारा उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जा रहा है।
नेपियर उत्पादन में स्थानीय प्रशासन का पूरा सहयोग मिल रहा है।
हरा चारा सभी तक पहुँचाने की योजना
उमा कल्याण ट्रस्ट का उद्देश्य है कि कोई भी गोवंश भूखा न रहे। इसलिए नेपियर उत्पादन से प्राप्त हरा चारा राल गोशाला के साथ-साथ गोपालक किसानों और छोटी गोशालाओं को भी देने की योजना बनाई गई है।इससे इन्हें गोवंश के लिए लागत मूल्य पर नेपियर चारा प्राप्त हो सकेगा।
अभी तक नेपियर के बीज खरीदकर लगाए गए हैं, लेकिन अब अपनी खेती से नेपियर के बीज तैयार किए जा रहे हैं। इससे भविष्य में बीज खरीदने की आवश्यकता कम होगी और उत्पादन को अधिक आत्मनिर्भर बनाया जा सकेगा।
प्रोटीन और विटामिन से भरपूर नेपियर घास गोवंश के पोषण के लिए उत्तम खाद्य पदार्थ है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यदि इसे खेत में एक बार लगा दिया जाए तो यह अगले 8 से 9 वर्षों तक हरे चारे के रूप में वर्ष भर प्राप्त होता रहता है।
गोपालकों के लिए नेपियर खेती के लाभ
गोपालकों को गर्मी के दिनों में हरे चारे की कमी होने लगती है। किसान भाई नेपियर की खेती कर हरे चारे की पूर्ति कर सकते हैं। इससे उन्हें दूध का उत्पादन भी अच्छा मिल सकता है, आय में वृद्धि हो सकती है और उनकी गाय स्वस्थ रहती हैं।
नेपियर की फसल तेजी से बढ़ने वाली होती है और कम समय में पर्याप्त मात्रा में हरा चारा उपलब्ध कराती है। इसकी खास बात यह है कि यह न केवल गोवंश के लिए पोषक है, बल्कि जूसी होने के कारण गोवंश इसे चाव से खाते हैं।
नेपियर घास को गोवंश के चारे के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है। इसमें लगभग 8 से 10 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, करीब 30 प्रतिशत क्रूड रेशा और 0.5 प्रतिशत कैल्शियम पाया जाता है। इसमें 16 से 20 प्रतिशत शुष्क पदार्थ, लगभग 60 प्रतिशत पाचन क्षमता और करीब 3 प्रतिशत ऑक्सालेट बताया जाता है।
गोवंश को नेपियर खिलाने की व्यवस्था
नेपियर की कटाई कर इसे भूसे में मिलाकर गोवंश को खिलाया जाता है। सामान्यतः चार किलो भूसे में दो किलो नेपियर घास मिलाने से अच्छा परिणाम मिलता है।
नेपियर घास को दलहनी चारे के साथ मिलाकर गोवंश को खिलाना और भी अच्छा होता है। यदि किसान अपने खेत के एक हिस्से में नेपियर घास लगा दें तो सालभर चारे की चिंता काफी हद तक खत्म हो सकती है।
दूध उत्पादन बढ़ाने में भी नेपियर घास अहम भूमिका निभा सकती है। गाय को नेपियर घास मिलाने से अच्छे परिणाम मिलते हैं। लगातार नेपियर खिलाने से दूध उत्पादन बढ़ सकता है और गोवंश स्वस्थ बने रह सकते हैं। यह चारा पचाने में भी आसान होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार नेपियर चारे की फसल की खेती कर गोपालक न केवल चारे की कमी दूर कर सकते हैं, बल्कि दूध उत्पादन बढ़ाकर अपनी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं।
नेपियर उत्पादन की मुख्य चुनौतियाँ
नेपियर उत्पादन से गोवंश के लिए वर्षभर हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसके उत्पादन में कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों का ध्यान रखना आवश्यक है।
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पानी की अधिक आवश्यकता: नेपियर एक उच्च जल-खपत वाली फसल है। अच्छी पैदावार के लिए इसे सालभर नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है, जो सूखे क्षेत्रों में चुनौती बन सकती है।
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जलवायु और पर्यावरणीय कारक: गर्म और नम जलवायु उपयुक्त है, लेकिन अत्यधिक ठंड या कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता होती है। पाला फसल को नुकसान पहुंचा सकता है और सर्दियों में इसकी वृद्धि लगभग रुक जाती है।
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मिट्टी की उर्वरता पर प्रभाव: नेपियर मिट्टी से तेजी से पोषक तत्व खींचती है। नियमित रूप से खाद और उर्वरकों का उपयोग न किया जाए तो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति प्रभावित हो सकती है।
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ऑक्सालेट की समस्या: कच्ची या कम उम्र की नेपियर घास में ऑक्सालेट की मात्रा अधिक हो सकती है। अत्यधिक मात्रा में सेवन गोवंश के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
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लकड़ी जैसा तना: यदि फसल की कटाई समय पर न की जाए तो इसका तना सख्त और लकड़ी जैसा हो जाता है। इससे गोवंश के लिए इसकी स्वीकार्यता और पोषण गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
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फसल प्रबंधन और श्रम: कटाई और छंटाई में अधिक शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है। टिड्डियों जैसे कीटों का प्रकोप भी उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।
कीट और रोग: नेपियर घास के उत्पादन में सिर की सड़ी और स्टंट जैसी बीमारियों का प्रकोप भी एक चुनौती है, जो उपज और गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
हरा चारा आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम
नेपियर घास उत्पादन का यह प्रयोग गोपालन और गौ चारे की दृष्टि से एक नई क्रांति का सृजन कर सकता है। वर्षभर हरे चारे की उपलब्धता से राल गोशाला सहित गोपालक किसानों और छोटी गोशालाओं को भी लाभ पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
इस योजना के माध्यम से गोवंश के पोषण को बेहतर बनाने, चारे की समस्या को कम करने और गोपालक किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है।
डॉ. अजय सिंह
विशेषज्ञ, नेपियर उत्पादन