गौ धाम गुरुकुल
नन्हीं आँखों में चमकता सुनहरा भविष्य
गुरुकुल के उत्तरोत्तर विकास के साथ श्रीनारायण अग्रवाल जी का लक्ष्य है कि गुरुकुल से निकले बच्चे सजग, सभ्य हों, साथ ही ज़िम्मेदार और मेहनती होने के अलावा आत्मनिर्भर हों तथा गौ सेवा और गौ संरक्षण में समर्थ हों। ताकि भारत का भविष्य एक बार फिर उस संस्कृति में फले-फूले जहाँ गोवंश सदैव आस्था का प्रतीक बन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
राल गोशाला में रहने वाले गौ सेवकों के बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए गोशाला परिसर में एक गुरुकुल संचालित किया जा रहा है।
अगस्त 2024 में राल गोशाला के कार्य में सहयोग देने के लिए पहली बार श्रीनारायण अग्रवाल जी ने परिसर में प्रवेश किया तो गोशाला में नंगे पैर, धूल धूसरित बच्चों ने उनका ध्यान आकर्षित किया। वो ठिठक गए और रुककर उन बच्चों से बात करने लगे। तब उन्हें ज्ञात हुआ कि वे सभी गोशाला में काम करने वाले गौ सेवकों के बच्चे हैं। श्रीनारायण अग्रवाल जी गोशाला का निरीक्षण कर वापस तो लौटे लेकिन उनके मस्तिष्क में उन बच्चों की छवि धूमिल नहीं हुई।
सितम्बर 2024 में जब गौ धाम टीम ने राल गोशाला के मैनेजमेंट में सहयोग देना आरम्भ किया तभी से एक टीम उन बच्चों के लिए भी कार्य करने लगी। गोशाला में रहने वाले गौ सेवकों के बच्चों को एक सुनहरा भविष्य मिले, वो शिक्षित होने के साथ ही संस्कार सीखें, पारंपरिक ज्ञान प्राप्त करें और उन्हें पौष्टिक आहार मिले, श्रीनारायण अग्रवाल जी की इस परिकल्पना को साकार करने के लिए जब टीम ने बच्चों को अस्थायी गुरुकुल में बुलाना शुरू किया तब उनके लिए कोई स्थान सुनिश्चित नहीं था।
आरम्भ में बच्चों की संख्या भी बहुत कम थी, लेकिन नई यूनिफार्म और जूते-मोज़े पाकर उन बच्चों का उत्साह बढ़ गया था। जब गोशाला के अन्य बच्चों ने देखा कि उनके साथी जो अब गुरुकुल जाने लगे हैं, वे साफ़-सुथरे दिखते हैं, नई बातें सीखते हैं और पौष्टिक आहार का आनंद भी लेते हैं तब वे भी उस अस्थायी गुरुकुल में आने लगे।
कुछ प्रयास करने पर गोशाला में अन्नपूर्णा भोजनालय के पीछे स्थित बरामदा गुरुकुल के लिए प्रयुक्त होने लगा।
इस बीच स्थानीय प्रशासन ने गुरुकुल के बच्चों की प्रतिभा को देखते हुए गुरुकुल के लिए दो कमरे बनवा दिए। गुरुकुल का अब अपना स्थान हो गया। किंतु गुरुकुल का सही प्रयोजन तब सिद्ध हुआ जब अगस्त 2025 में राल गोशाला को संचालित करने का पूरा दायित्व श्रीनारायण अग्रवाल जी को सौंपा गया। अब गुरुकुल उत्तरोत्तर विकास के पथ पर अग्रसर है।
मंत्रोच्चार, योग और ईश वंदना से दिन की शुरुआत
गुरुकुल में सुबह मंत्रोच्चार से आरंभ होती है। फिर बच्चे योग और ईश वंदना करते हैं।
पौष्टिक आहार और प्रसन्न बचपन
दोपहर का भोजन भजन और भोजन मंत्र से संपन्न होता है।
शाम को सभी बच्चों को दूध के साथ हलवा, बूंदी, कॉर्नफ्लेक्स, बिस्किट आदि का रिफ्रेशमेंट दिया जाता है।
नन्हें बच्चों के लिए डे केयर सिस्टम
गुरुकुल में पढ़ने के लिए दो वर्ष से लेकर तेरह वर्ष की आयु वर्ग तक के बच्चे आते हैं। दो से पाँच वर्ष के बच्चों के लिए यह ‘डे केयर सिस्टम’ है।
‘डे केयर सिस्टम’ में बच्चों को सफ़ाई के साथ रहने, बैठने और बोलने का तरीका सिखाया जाता है।
इन बच्चों की माताएं गोशाला में काम करते हुए निश्चिंत रहती हैं कि उनके नन्हें-मुन्ने गुरुकुल में सुरक्षित हैं और खुश हैं। छोटे बच्चों को मौखिक शिक्षा दी जाती है। खेल-खेल में नई बातें सीखकर बच्चों का उत्साह निरंतर बढ़ता है।
शिक्षा और संस्कार का संगम
बड़े आयु वर्ग के बच्चे हिंदी, अंग्रेज़ी और गणित की शिक्षा प्राप्त करते हैं। पढ़ना और लिखना सीखते हैं। उन्हें औपचारिक इतिहास, भूगोल और विज्ञान की शिक्षा देने के साथ ही सामान्य ज्ञान की जानकारी हो, इसके लिए विशेष शिक्षकों द्वारा समय-समय पर कक्षाएं आयोजित होती हैं।
पढ़ाई के अतिरिक्त यहाँ बच्चे हनुमान चालीसा, श्रीराम स्तुति, गौ चालीसा और गायत्री मंत्र का जाप नित्य करते हैं। गुरुकुल का वातावरण उन नन्हें बच्चों के कंठ से निकले मंत्रोच्चार से ऊर्जावान रहता है।
समय-समय पर इन बच्चों के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाता है जिसमें वे बड़ी उमंग से भाग लेते हैं।
रचनात्मक गतिविधियों से सीखने का अवसर
कुछ नया सीखने का जोश इन बच्चों में हमेशा बना रहता है। समय-समय पर विशेष कक्षा में वे गोबर और मिट्टी से तरह-तरह के खिलौने बनाते हैं।
पुराने कपड़ों से बैग्स बनाते हैं और पेपर कटिंग द्वारा नए मॉडल्स और डिज़ाइन बनाना सीखते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजगता
गुरुकुल के बच्चों में पर्यावरण के प्रति विशेष सजगता सहज ही उत्पन्न हो जाती है, जब वे अपने आसपास के वातावरण को समझने लगते हैं। इसी का परिणाम है कि इन बच्चों द्वारा गोशाला परिसर में “नो प्लास्टिक ज़ोन” बनाया गया है।
गुरुकुल प्रांगण में बच्चों ने स्वयं क्यारी तैयार कर एक पोषण वाटिका बनाई है।
गुरुकुल के परिसर में लगे वृक्षों को सुरक्षा का उत्तरदायित्व भी इन बच्चों ने उठाया है। इसके तहत अपनी रुचि के अनुसार वृक्ष का चुनाव कर इन बच्चों ने ‘वृक्ष मित्र’ बनाए हैं और इनके नाम भी रखे हैं।
अतिथियों का विशेष सत्कार
राल गौशाला के इस अनोखे गुरुकुल में समय-समय पर अतिथियों का सत्कार भी बड़े विशेष ढंग से होता है। वापस जाते हुए अतिथि अपने साथ इन बच्चों के उत्साह का अंश और इस विशिष्ट गुरुकुल के प्रति विशेष स्नेह लेकर लौटते हैं।
कलर बॉक्स, यूनिफार्म, जूते-मोज़े, कॉपी, पेंसिल हो या कोई नया खिलौना या फिर क्लास में लगा नया चार्ट, ये बच्चे कुछ नयापन जुड़ते ही किलक उठते हैं। आने वाले कल के लिए हमारा एक छोटा सा प्रयास कितना मायने रखता है, इन नन्हीं आँखों की चमक में साफ़ नज़र आता है।
गुरुकुल का संकल्प और भविष्य की दिशा
गुरुकुल के उत्तरोत्तर विकास के साथ श्रीनारायण अग्रवाल जी का लक्ष्य है कि गुरुकुल से निकले बच्चे सजग, सभ्य हों, साथ ही ज़िम्मेदार और मेहनती होने के अलावा आत्मनिर्भर हों तथा गौ सेवा और गौ संरक्षण में समर्थ हों।
ताकि भारत का भविष्य एक बार फिर उस संस्कृति में फले-फूले जहाँ गोवंश सदैव आस्था का प्रतीक बन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
गौ धाम गुरुकुल की झलकियां
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